हां वो आया है आज चित्रों का व्यापारी
रंगो का रहनुमा, गुजरते समय को निहारता
कैमरे की आंख से अपनी आंख को सटाऐ
टकटकी लगा फ्रेम में समाने की कोशिश
करता एक शख्स ।
क्लिक की आवाज से चौंका मैं
हां उतार दिया उसने कितने ही पेङ-पौधों,
रेत और मानुषों को अपनी कैनवास पर
कहता है चित्र मुझे खींचते हैं
लेकिन जब भी मैने उसे देखा
वो चित्रों को खींचता ही पाया गया
झूठा है । मुझे क्या?
रंगो का रहनुमा, गुजरते समय को निहारता
कैमरे की आंख से अपनी आंख को सटाऐ
टकटकी लगा फ्रेम में समाने की कोशिश
करता एक शख्स ।
क्लिक की आवाज से चौंका मैं
हां उतार दिया उसने कितने ही पेङ-पौधों,
रेत और मानुषों को अपनी कैनवास पर
कहता है चित्र मुझे खींचते हैं
लेकिन जब भी मैने उसे देखा
वो चित्रों को खींचता ही पाया गया
झूठा है । मुझे क्या?
चित्रकारों और कैमरामैनों को समर्पित मेरी कविता।
ReplyDelete