Skip to main content

मुझे क्या ।

हां वो आया है आज चित्रों का व्यापारी
रंगो का रहनुमा, गुजरते समय को निहारता
कैमरे की आंख से अपनी आंख को सटाऐ
टकटकी लगा फ्रेम में समाने की कोशिश
करता एक शख्स ।
क्लिक की आवाज से चौंका मैं
हां उतार दिया उसने कितने ही पेङ-पौधों,
रेत और मानुषों को अपनी कैनवास पर
कहता है चित्र मुझे खींचते हैं
लेकिन जब भी मैने उसे देखा
वो चित्रों को खींचता ही पाया गया
झूठा है । मुझे क्या?

Comments

  1. चित्रकारों और कैमरामैनों को समर्पित मेरी कविता।

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

मेरा क्या !

जब मैं मेरे होता हूँ  तो परम् घेरे में होता हूँ । जब मैं अकेले में होता हूँ। तो मैं झमेले में होता हूँ ।  जब में एकान्त होता हूँ।            तो मैं शान्त होता हूँ । जब मैं भक्ति में होता हूँ । तो मैं शक्ति में होता हूँ । जब मैं नृत्य में होता हूँ , महान कृत्य में होता हूँ । जब मैं आहों में होता हूँ , सुनसान राहों में होता हूँ । जब मैं  ध्यान में होता हूँ , तो भगवान् में होता हूँ । जब मैं प्यार में होता हूँ , सर्व स्वीकार में होता हूँ । जब मैं मुझमें होता हूँ , तो तुझमें भी होता हूँ । मेरा क्या? होता हूँ बस । कहीं न कहीं ।।                        - ओम पंवार

ओशो